बधाई उन बच्चों को जिनकी मुर्गी ने पहला सुनहरा अण्डा दिया

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रविवार, 14 जुलाई 2013

फलों की बात करते तिलचट्टे

 चित्र गूगल से 
यह एक बंद कमरा है। जहां अंधेरा ही अंधेरा है। रेहान एक डरपोक लड़की है। वह बंद कमरे में जाने से डरती है। इसलिए उसे सब डरपोक लड़की कहते है, क्योंकि एक तो उसे अंधेरे से डर लगता है। दूसरे इसमें तिलचट्टे अर्थात काॅकरोच रहते है। जिनकी यहां पूरी काॅलोनी बसी हुई है।
रेहान उन्हें बहुत गौर से देखती है और यह भी जानती है कि अभी शाम होते ही तिलचट्टों का नाच शुरू होने वाला है- सामूहिक नृत्य। कुछ तिलचट्टे संगीत पैदा करेंगे तो कुछ नृत्य में शामिल होंगे। रेहान के लिए यह सब बहुत डरावना है।
 चित्र गूगल से 
 उसकी मुश्किल यह है कि ये केेले के टोकरे उसे इसी बंद कमरे के अंदर रखने है। अब्बू का आदेश जो है। जिसे मानना ही है। बंद कमरे के बाहर उसने कान लगा दिए।
सभी चित्र गूगल से 
तिलचट्टों का नाच शुरू हो गया है। संगीत की आवाज सुनाई दे रही है। कुछ देर तक कान टिकाकर रेहान सुनती रही।
इसके बाद सर्र ऽ सर्र ऽ ऽ करता बंद कमरे का दरवाजा खुला। रोशनी की एक लकीर भीतर घुसी।
भागो...भागो....जान बचाओ....खतरा! तिलचट्टे अपने अपने घरों में दुबकने लगे। उन्हें भागता दुबकता देख रेहान अपनी चीख नहीं रोक सकी। उसने सुना तिलचट्टे कह रहे थे- ‘‘भागो...भागो ... मनुष्य भीतर घुसे है।
- हां मैने भी देखा बड़ा टोकरा उठाए हुए है।
- क्या उन टोकरों में कुछ खाने का सामान है?
- मालूम नहीं, हिम्मत किसकी जो जाकर देखे।
- सुगंध तो अच्छी आ रही है।
- देखो अब शान्त हो जाओ। वो मनुष्य टोकरे में से कुछ रख रहे है।
रेहान पांव दबाकर भीतर बढ़ रही थी। डरे, दुबके तिलचट्टों की खुसर-पुसर उसे फिर सुनाई देने लगी। वे कह रहे थे-
- नाच का कार्यक्रम मनुष्य की वजह से बर्बाद हो गया भैया।
- बहुत बुरा हुआ।
उदास तिलचट्टों का बतियाना जारी था।
- हमें अपनी काॅलोनी में सुखपूर्वक रहने नहीं दिया जाता।
- मनुष्यों की शिकायत होनी चाहिये।
‘शिकायत’ रेहान चैंकी। उसने टोकरा नीचे रखते हुए देखा हर बिल में कुछ न कुछ बात चल रही है। टोकरा खाली कर वह उल्टे पांव लौटी। एक तिलचट्टे ने कमरा बंद होने की सूचना सबको दी। रेहान ने फिर से अपने कान बंद दरवाजे से सटा दिए। ताकि वो तिलचट्टों की बात सुन सके। वे कह रहे थे-
- हे कोई ऐसा बहादुर जो पता करके आये कि टोकरे में क्या सामान लाया गया है? हमारे काम का सामान है या कोई फालतू की चीज। किसी एक तिलचट्टे को ीोजा जाए।
एक पतला किन्तु फुर्तीला तिलचट्टा इसके लिए तैयार हुआ। हरिमो उसका नाम है। वह जितनी फुर्ती से गया उतनी ही जल्दी से टोकरी पर चढ़कर लौट आया। उसने सबको बताया - ‘‘ये टोकरी तो कच्चे केलो से भरी हुई है।’’
 चित्र गूगल से 
- कच्चे केल? ये कैसे कह सकते हो तुम कि केले कच्चे है?
- कच्चा केला हरे रंग का होता है। मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूं। सिर पर लगे अपने  सिंगनल देने वाले दोनों एंटीना को झाड़ते हुए हरिमो ने बताया।
यह सुनकर रेहान को बेहद आश्चर्य हुआ।
- तो क्या अब वह हमारे काम के नहीं है हरिमो? नन्हें देशाजू ने पूछा।
- नहीं, देशाजू केले के पकने का इंतजार करना पड़ेगा हमें।
- हरिमो क्या तुम बता सकते हो कि केले पकने में कितने दिन लगेंगे?
- अरे मूर्ख पेड़ से केले टूट चुके है। वे अब कैसे पक सकते है?
- तो फिर केलो को पकने के बाद तोड़ा जाना चाहिये था। रेहान ने झांककर देखा। यह पोपले मुंह वाले पपलू की राय थी।
- क्या यह खाने लायक है?
- क्या हमें इन्हें खाना चाहिए अभी?
मामला कुछ तिलचट्टों को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए?
- चलो, सब चलते है हरिमो के पिता नरिमो से पूछते है। वो वनस्पिति वैज्ञानिक है। उन्हें सब पता है। रेहान ने तिलचट्टों की एक टुकड़ी को दूसरी ओर जाते हुए देखा। यह वो जगह थी जो थोड़ी साफ, खुली व हवादार थी। हरिमो के पिता नरिमो ने सारी बात पहले समझी कि तिलचट्टो को क्या समझना है। फिर कहने लगे- ‘‘मैं अपने अध्ययन के अनुभव पर कुछ कह सकता हूं। सब इन बिन्दुओं पर ध्यान दो-
*कच्चा केला हरा होता है पर पकने के बाद वह पीला हो जाता है।
 *कच्चा केला फीका होता है पर पक्का केला मीठा।
कच्चा केला हरा होता है पर पकने के बाद वह पीला - चित्र गूगल से 
बहुत बढि़या बात। सब तिलचट्टे खुश होने लगे। कुछ कहने लगे- हमें केले पकने का इंतजार करना पड़ेगा। उनमें से एक तिलचट्टे ने अपने सिर पर बनी दोनो गोल आंखों को घुमाते हुए पूछा- पर केला पकेगा कैसे? नरिमो ने फिर कुछ बिन्दु ध्यान से सुनने के लिए कहे-
 *केले के छिलके में पर्णहरित अर्थात जिसे तुम क्लोरोफिल भी कहते हो, होता है। वही पर्णहरित इनके पकने में मददगार होता है।
 *तुम्हें सबको पता होना चाहिए कि पेड़ से टूटने के बाद भी केले सांस लेते है। छिलके में सूक्ष्म छिद्रो जिसे हमलोग ‘रन्ध्र’ कहते है उससे हवा बाहर आती जाती है। हवा के साथ ही आॅक्सीजन अन्दर जाती है। इस तरह छिलके सांस लेते है और क्लोरोफिल अपना काम करना जारी रखता है। सब पूरे ध्यान से सुनो। अब जो मैं बात बता रहा हूं वह बहुत खास बात है-
 *क्लोरोफिल का काम होता है जरूरी हार्मोन पैदा करके फल के भीतर पहुंचाना। जो वह निरंतर करता रहता है।
 *धीरे धीरे केले का हरा छिलका जो मोटा होता है अब पतला होकर पीला होता जाता है।
हां, यह बिल्कुल सही है एक बूढ़े तिलचट्टे ने कहा। मैंने हरे कच्चे केले और पक्के पीले केले दोनों ही देखे है। नरिमो ने अपनी बात आगे जारी रखते कहा- कुछ बिन्दु और सुनो-
 *क्लोरोफिल या पर्णहरित जो पोषक तत्व केले में डालता है उसी से फल का स्टार्च शूगर में बदल जाता है। इस तरह फीका केला मीठा हो जाता है।
 चित्र गूगल से 
बहुत खूब-2 सब नाचने लगे। क्या ऐसा सब फलों के साथ होता है? एक लंगड़े तिलचट्टे ने पूछा। क्या हमें इनके पककर मीठे होने का इंतजार करना पड़ेगा। आम की तरह ही। कच्चा आम भी तो पककर मीठा हो जाता है। क्या सब फलों के साथ ऐसा होता है?
नहीं, नीबू के साथ तो ऐसा नहीं है। कच्चे नीबू का छिलका हरा और मोटा होता है पर पकने के बाद पीला और पतला हो जाता है, किन्तु उसका रस तो खट्टा ही रहता है। लंगड़े तिलचट्टे ने जब ऐसा कहा तो सब नरिमो का मुंह देखने लगे।
- फलों के रंग बदलने की बात तुमने सही कही। पेड़ पर लगे कई कच्चे फलों का रंग अलग होता है जो पकने के साथ ही बदलता जाता है। ब्लैकबेरी को ही लो। पहले लाल होती है फिर पककर काली हो जाती है।
  पहले लाल होती है फिर पककर काली-चित्र गूगल से 
बड़ा विचित्र संसार है फलों का। इनके रंग और स्वाद बदल जाते है। फिर इनके गुणों में भी बदलाव आ जाता है। पकने के बाद फल खाने लायक और अधिक फायदा देने वाले हो जाते है। जो कुछ मैं जानता था तुम सबको बता दिया। 
रेहान को तिलचट्टों की बाते बड़ी रोचक लगी। ये तो बड़े समझदार है। मैं बेकार ही इनसे डरती हूं। उसने बंद दरवाजे की दरार से झांककर देखना चाहा। धीरे से दरवाजा खोला। दरवाजे के खुलते ही तिलचट्टे फिर भागे। एक नादान तिलचट्टा रेहान के पांव पर चढ़ आया। पांव से होता हुआ फ्राॅक पर जा पहुचा।
उई ऽ आ! उईऽ ऽ रेहान चिल्लाती हुई कूदने लगी। उसका शोर सुन तिलचट्टे डर के मारे फिर इधर उधर दुबकने लगे। रेहान को चिल्लाते देख मां बोली- ‘‘क्या डरपोक लड़की है।’’

रविवार, 4 अप्रैल 2010

दुम दबाकर

काली बिल्ली ने सफेद बिल्ली को देखा और सफेद ने काली को। काली ने खुश होकर सफेद से कहा- ‘‘तुम्हें देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई।’’
‘‘मुझे भी’’ सफेद ने जवाब दिया।
‘‘कहां रहती हो?’’ काली ने पूछा।
‘‘अभी नई-नई आई हूं, रहने की जगह तलाश कर रही हूं।’’
‘‘मेरे घर रहोगी?’’ काली बिल्ली ने उससे आग्रह किया।
‘‘मैं अकेली रहती हूं तुम साथ रहोगी तो अच्छा लगेगा।’’
सफेद बिल्ली खुश होकर काली के साथ उसके घर चल दी। दोनों घर पहुंची।
‘‘वाह! तुम्हारा घर तो बहुत सुन्दर है। क्या खूब तुमने इसे सजाया है। इसमें लाईब्रेरी भी है! क्या कहने।’’ सफेद बिल्ली प्रशंसा करते हुए बोली।
‘‘मुझे पढ़ने का बेहद शौक है। अच्छी किताबे पढ़ना मुझे पसन्द है। तुम बैठो मैं खाने का कुछ लाती हूं।’’ कहती हुई काली बिल्ली रसोई में चली गई।
एक दूसरे को पाकर दोनों बिल्लियां बहुत खुश थी। काली बिल्ली को सफेद बिल्ली का रंग भा गया था और सफेद को काली का करीने से सजा घर। घर में वे सारी सुख-सुविधाएं थी जो वह चाहती थी।
सुबह काली ने सफेद को पुकारा- ‘‘उठो-उठो सुबह हो गई है।’’
‘‘ऊं हूं इतनी जल्दी! अभी थोड़ा सोने दो मुझे....।’’
कुछ देर बाद काली बिल्ली ने फिर सफेद को उठाने का प्रयास किया।‘‘उठो-उठो सफेद रानी, देखो मैं तैयार हो गई और नाश्ता भी ठण्डा हो रहा है...।’’
नाश्ते का नाम सुन सफेद बिल्ली उठ खड़ी हुई।
‘‘ये सुबह-सुबह कहां जाने की तैयारी कर रही हो काली?’’
‘‘चलो मैं तुम्हें भी ले जाना चाहती हूं। अब सुस्ती छोड़ो और फटाफट तैयार हो जाओ।’’
सफेद बिल्ली ने लम्बी जम्हाई ली और हाथ पैर मरोड़ने लगी। यह देख काली बोली- ‘‘उठो नहीं तो मुझे देर हो जायगी।’’
दोनों बिल्लियां तैयार होकर बाहर निकल पड़ी। काली सफेद को अपने खेत पर ले गई, ‘‘ये मेरा खेत है। इस बार मैंने चने की फसल बोई है।’’
सफेद आश्चर्य से आंखे मटकाती हुई बोली- ‘‘आहा! इत्ती बढ़िया फसल ऐसी लहलहाती फसल मैंने पहले कभी नहीं देखी। वाकई तुम बहुत मेहनती हो काली।’’
‘‘हां अब हम दोनों मिलकर काम करेंगी तो और अच्छी-अच्छी फसल बोएंगी। चलो ये फावड़ा लेकर तुम इस सिरे से खुदाई शुरू कर दो और मैं उस सिरे से।’’
सफेद ने बेमन से फावड़ा उठाया। अभी उसने दो-तीन फावड़े मिट्टी में चलाए ही थे कि उसे पसीना छूटने लगा।
‘‘इतनी तेज धूप बर्दाश्त नहीं होती काली।’’
‘‘हां तभी तो जल्दी आ जाती हूं। सुबह कुछ देर काम कर दिन में यहीं थोड़ा सुस्ता लेती हूं। खेती करना आसान काम नहीं है सफेद...।’’
‘‘हां बड़ी मेहनत करनी पड़ती है यह तो मैं देख रही हूं।’’ थोड़ी देर बाद सफेद बिल्ली फावड़ा छोड़ खड़ी हो गई।
‘‘तेज धूप में मेरा सिर दुखने लगा है काली।’’
‘‘लगता है तुम्हें मेहनत करने की आदत नहीं। जाओ, घर जाकर सो जाओ।’’
सफेद बिल्ली खुशी-खुशी घर की ओर चल दी। काली दिन भर खेत पर काम करके जब लौटी तो देखा सफेद बिल्ली बिस्तर पर लेटी किताब पढ़ने में मगन है। काली को देखते ही कहने लगी- ‘‘तुम आ गई, मुझे तो बहुत भूख लग रही है। मारे सिरदर्द के मैं खाना बना ही नहीं पायी।’’ ‘‘अभी बना लेती हूं’’ कहती हुई काली बिल्ली खाना बनाने में जुट गई। प्लेटो में खाना सजाकर उसने सफेद को पुकारा-
‘‘आओ खाना खा ले।’’
‘‘क्या बनाया है।’’ किताब पढ़ते हुए सफेद ने वहीं से पूछा।
‘‘चने के पत्तों की सब्जी, बस आज यहीं बना पायी हूं।’’
‘‘ऊंह! यह भी कोई खाना है।’’
‘‘जल्दी में इतना ही बना पायी। फिर मैं थकी हुई भी थी। सुबह मक्खन-रोटी बना लूंगी।’’
मक्खन-रोटी के नाम से सफेद के मुंह में पानी भर आया ‘चलो आज चने की साग खाकर ही संतुष्ट हो जाएं कल तो मक्खन रोटी मिल रही है न!’ सोचती हुई सफेद बिल्ली उठ खड़ी हुई। दोनों ने खाना खाया और सो गई। काली बिल्ली को सोते ही नींद आ गई पर सफेद सुबह के इन्तजार में करवटे बदलने लगी। उसे सपने में मक्खन रोटी दिखाई देने लगी।
सुबह फिर काली ने सफेद को उठाया। किन्तु सफेद बिल्ली नहीं उठी। कहने लगी- ‘‘रात को देर तक नींद नहीं आयी, अब नींद आ रही है तो थोड़ा जी भर कर सो लूं।’’ यह कहकर उसने चादर में मुंह ढ़क लिया।
काली, सफेद की मक्खन रोटी छोड़ अपने काम पर निकल पड़ी। दिन भर वह खेत में काम करती हुई सफेद बिल्ली का इन्तजार करती रही पर सफेद बिल्ली नहीं आयी।
शाम जब वह घर पहुंची तो देखा सफेद लेटी हुई है। वह चिन्तित होती उसके पास पहुंची- ‘‘क्या हुआ सफेद रानी?’’
‘‘अरी तुम आ गयी! माफ करना भई! आज पेट में बहुत दर्द था इसलिये खेत पर न आ सकी।’’
काली ने चुपचाप खाना बनाया, सफाई की। सफेद लेटी हुई देखती रही।
‘‘आओ खाना तैयार है’’ काली बिल्ली ने उसे पुकारा।
‘‘क्या बनाया है?’’
‘‘आज दो चूहों का शिकार किया था सो मेरे लिये वहीं बनाएं परन्तु तुम्हारे लिये दलिया बनाया है।’’
चूहों के नाम से सफेद के मुंह में पानी भर आया, ‘‘चूहे! सुना है चूहे खाने से पेट दर्द ठीक हो जाता है। ऐसा करो चूहे मैं खा लेती हूं और दलिया तुम खा लो’’ और फटाफट उठकर उसने दोनों चूहे खा लिए। काली से पूछा तक नहींं। अब काली बिल्ली को समझ आ गया था कि सफेद बिल्ली न केवल बहानेबाज है बल्कि आलसी भी है। मेहनत करना नहीं चाहती और अच्छा खाना चाहती है। कोई उपाय करना होगा।
दूसरे दिन काली बिल्ली ने तैयार होते हुए सफेद से कहा- ‘‘आज मेरा जन्मदिन है। मलाई वाली खीर बनाऊंगी। शाम को मेरे सभी मित्र दावत खाने आएंगे। आज जरा खेत पर तुम चली जाओ।’’
मजबूरन सफेद बिल्ली को उठकर खेत पर जाना पड़ा। ‘‘अगर आज उसने कोई बहाना बनाया तो शायद मलाई वाली खीर खाने को न मिले।’’ मन ही मन उसने सोचा।
शाम जब सफेद बिल्ली लौटी तो घर की सजावट देख चौंक उठी। खीर की मीठी सुगन्ध से उसका मन नाच उठा। उसने तेज सांस खींची। खीर की सुगन्ध से उसके मुंह में पानी भर आया।
‘‘आ गई सफेद रानी। जाओ जरा बगीचे से फूल चुन लाओ। मेरे मित्र आते ही होंगे।’’
‘‘ओह!’’ सिवाय काली बिल्ली का कहना मानने के और कुछ उपाय भी तो उसके पास न था। थकी होने के बाद भी वह फूल चुनने निकल पड़ी।
टिंकू खरगोश, पिंकी मेमना, झुंझुन मुर्गा, हरिल तोता, भूरी गौरया सभी मित्र काली बिल्ली को जन्मदिन की बधाई देते हुए एक-एक कर अन्दर आए। काली बिल्ली के लिये सभी कुछ न कुछ उपहार लेकर आये थे। काली ने सभी मित्रों से सफेद का परिचय कराया।
दावत शुरू होने से पहले सफेद बिल्ली बोली- ‘‘मित्रों आप सभी जन्मदिन का कोई न कोई उपहार लेकर आये है परन्तु मैं उपहार में एक खेल लेकर आई हूं। सबके मनोरजंन के लिए।
‘‘कौनसा खेल?’’ सभी एकसाथ बोल उठे।
‘‘लुका छिपी का खेल है यह। मैं आंख बंद करूंगी तब सब छिप जायेंगे। जब मैं आंखे खोलूंगी तो सबको ढूंढूगी।’’
‘‘आहा! बड़ा अनूठा खेल है। मैंने तो पहले कभी नहीं खेला।’’
सभी खेल के लिए उत्सुक थे। सफेद बिल्ली सभी को छिपने के लिए कहकर बोली- ‘‘पहले खेल होगा फिर दावत का आनंद होगा’’ इतना कह वह रसोई में चली गई और गिनती बोलने लगी। एक...दो...तीन...तभी उसकी नजर खीर पर गयी। वह गिनती भूल खीर चाटने लगी। ‘‘वाह! बहुत स्वादिष्ट खीर बनी है।’’ जबान फिरा उसने होठो को साफ किया।
उसने दुबारा भगोने में मुंह डाला और चाटने लगी तभी ‘धड़ाम’ से भगौना नीचे गिर पड़ा। गिरने की आवाज सुन सभी अन्दर दौड़े आए।
सफेद बिल्ली रंगे हाथों पकड़ी गई थी। शर्म से वह पानी-पानी हो गई, उसका बुरा हाल था। वह दुम दबाकर वहां से भाग जाना चाहती थी किन्तु वह नीचे और खीर का भगौना उसके उपर औंधा गिरा हुआ था। रसोई के दरवाजे पर सभी खड़े उसे घूर रहे थे। उन सबमें काली बिल्ली भी थी और उससे आंख मिलाने की तो उसमें हिम्मत ही नहीं बची थी। अब? उसने किसी तरह से भगोने के नीचे से खुद को निकाला और चुपचाप सिर झुकाये दुम दबाकर घर से बाहर निकल जाने में ही अपनी खैर समझी। जाते-जाते उसके कानों में आवाज गिरी, ‘‘जाने दो मक्कार को। ये हमारे साथ रहने के काबिल नहीं।’’
टांग के दर्द से वह लंगड़ाती चली जा रही थी। किन्तु इस दर्द से ज्यादा अपनी बुरी आदत के कारण इतना अच्छा घर और मित्र छूट जाने का उसे बेहद अफसोस था। उसके बारे में कहे गये मित्रों के शब्द कानों में लगातार गूंज रहे थे। उसकी आंखों में आंसू भरे हुए थे।

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

बात छोटी सी

टीटू गिलहरी और चिंकी चिड़िया दोनों पड़ोसिन थी। टीटू का घर पेड़ की खोखल था और चिंकी का घोंसला पेड़ की शाखाओं पर। चिंकी जब दाना चुगने जाती तब टीटू सभी बच्चों का ध्यान रखती।
एक दिन बच्चे आपस में झगड़ने लगे। टीटू के बच्चों का कहना था कि पेड़ उनका है। चिंकी के बच्चे भी यही बात दोहरा रहे थे कि पेड़ उनका है।
लड़ते-लड़ते बच्चों में झगड़ा बढ़ गया। टीटू के बच्चों ने चिंकी के बच्चों के शरीर में अपने पंजे चुभा दिए तो चिंकी के बच्चों ने टीटू के बच्चों की पूंछ खींच ली। टीटू के बच्चे दर्द से चिल्लाने लगे। चिंकी के बच्चों के भी खून बहने लगा यह देख टीटू उन्हें समझाने लगी -
‘‘हम पड़ौसी है। हमें मिलजुल कर रहना चाहिए....’’
‘‘किन्तु मां चिंकी चिड़िया के बच्चे सब फलों को झूठा कर देते हैं, भला हम झूठे फल क्यों खाएं, जबकि पेड़ हमारा है।’’ टीटू के बच्चे एक स्वर में बोले।
‘‘तुम कैसे कह सकते हो कि ये पेड़ तुम्हारा है?’’ चिंकी के बच्चों ने प्रश्न किया।
हम पेड़ के तने में रहते है। हमारा जन्म इसी खोखल में हुआ। पेड़ का तना हमारा तो शाखाएं हमारी। शाखाएं हमारी तो फल हमारे। टीटू के बच्चों ने जवाब दिया।
यह सुन चिंकी के बच्चे फुर्र से उड़कर शाखाओं पर जा बैठे और कहने लगे पेड़ हमारा है। इसकी टहनियों पर हमारा बसेरा है। इस पर हमारा नीड़ बना हुआ है। जिसमें हमने आंखे खोली। हम तुम्हे टहनियों तक नहीं आने देंगे और न ही इसके फल खाने देंगे।
टीटू गिलहरी यह सुन बड़ी परेशान हुई। बच्चे लड़ाई पर उतारू थे और एक दूसरे को पेड़ से भगाना चाहते थे। वह उन्हें समझाने लगी-
बच्चों, मेरी बात सुनो। बात उस समय की है जब तुम लोगों का जन्म भी नहीं हुआ था। मैंने और चिंकी ने अण्डे दिए अभी एक दिन भी नहीं गुजरा था कि आसमान में अंधेरा छा गया। तेज हवाएं चलने लगी। डर के मारे चिंकी शोर मचाने लगी। उसे डर था कि शाखाएं हिलने से उसका घोसला नीचे गिर जाएगा। घोंसला गिर जाएगा तो फिर उसमें रखे अण्डे भी गिर कर फूट जायेगे।
तब मैंने और चिंकी ने मिलकर अण्डों को खोखल में सुरक्षित रख दिए। अभी कुछ देर हुई थी कि पानी बरसने लगा। पानी इतना बरसा, इतना बरसा कि नीचे बहता हुआ पानी हमारे घर तक पहुंचने लगा।
हमें फिर चिंता होने लगी। हमारा घर डूब गया तो ये पानी अण्डे बहा ले जायगा। तब मैंने और चिंकी ने मिलकर सभी अण्डों को घोंसले में पहुंचाया। फिर हम दोनों ने पत्तों से घोंसले को ढक दिया। जैसे-तैसे रात बीती। सुबह पौ फटने के बाद हमने राहत की सांस ली। बरसात बंद हो चुकी थी। देखा बच्चों हमने एक दूसरे के सहारे आंधी बरसात को झेला था। तब से अब तक हम अच्छे पड़ौसियों की तरह आपस में मदद करते आये हैं।
‘‘पड़ौसी एक दूसरे के काम आते हैं और सुख-दुख के साथी है बच्चों।’’ अब तक चिंकी चिड़िया भी दाना चुगकर लौट आयी थी। सभी बच्चों में बराबर अनाज के दाने बांटते हुए बोली।
परन्तु बच्चे कहने लगे, चिंकी चिड़िया को यह पेड़ छोड़ना होगा। अपने बच्चों के साथ कहीं ओर चली जाए। चिंकी के बच्चे भी यही बात अपनी मां के सामने दोहरा रहे थे।
दोनों की माताएं समझा-समझाकर थक गई पर बच्चे नहीं माने। अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे। अंत में टीटू और चिंकी दोनों ने पेड़ छोड़ने का मन में विचार बना लिया।
उधर बिल में छिपा सांप कब से यह तमाशा देख रहा था। आज उचित मौका देखकर वह बाहर निकला और पेड़ पर चढ़ने लगा। उसने सोचा पहले गिलहरी के बच्चों को निगलेगा फिर चिड़िया के बच्चों को। बहुत दिनों से वह इनके नरम नरम मांस खाने की फिराक में था किन्तु इनकी मैत्री को देखते हुए यह संभव नहीं हो रहा था।
सांप को पेड़ के तने पर चढ़ते हुए चिंकी चिड़िया ने देख लिया। वह जोर से चिल्लाई,
सावधान टीटू बहन, सांप ऊपर आ रहा है। अपने बच्चों को बचाना। ‘‘उन्हें मेरे घोंसलें में छिपा दो’’ - कहने के बाद वह पेड़ के तने पर चोंचे मारने लगी।
जहां जहां चिंकी की चोंच लगी पेड़ से गाढ़ा चिपचिपा दूध बहने लगा। चिपचिपे गोंद के कारण सांप का पेड़ पर चढ़ना मुश्किल होने लगा। इधर टीटू ने एक-एक कर सभी बच्चों को चिंकी के घोंसले में पहुंचा दिया। चिंकी के साथ उसके बच्चे भी मदद कर रहे थे। हालांकि अभी उनकी चोंचे नर्म और नाजुक थी।
थक हार कर सांप वापस बिल में लौट गया। किन्तु अभी खतरा टला नहीं था। कलुवा कौवे ने जब एक ही घोंसले में इतने सारे बच्चे देखे तो उसने आक्रमण कर दिया। टीटू और चिंकी ने कौवे से जमकर मुकाबला किया और उसे मार भगाया।
टीटू और चिंकी के बच्चों ने एकता की ताकत को देख लिया था और साथ ही में पड़ौसी के महत्त्व को भी समझ लिया था। अब उन्हें मां के समझाने की जरूरत नहीं थी। उनकी लड़ाई खत्म हो चुकी थी। वे सब पहले जैसे मिलजुल कर रहने लगे।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

नटखट तितली

नटखट तितली की मां बीमार थी। वह फूलों का मकरंद लाने में असमर्थ थी। मां की यह स्थिति देख नटखट तितली बोली- ‘‘मां आप आराम करो। आज मैं फूलों का मकरंद ले आऊंगी।’’
‘‘जरूर जाओ बेटी, पर सुन्दर-ताजे, खुशबू वाले फूलों का मकरंद ही चुनना, साथ ही जरा तितली पकड़ने वाले बच्चों से सावधान भी रहना।’’ मां की बात पूरी सुने बिना ही नन्हीं नटखट तितली अपने रंग-बिरंगे पंख फैला कर उड़ चली। बगीचे में रंग-बिरंगे फूल खिले थे। यह देख तितली खुशी से झूम उठी। ‘‘आ हा! कितने सुन्दर फूल! कमाल की खुशबू है इनमें!’’ वह सफेद फूलों की ओर बढ़ी और उन पर मंडराते हुए गाने लगी-
‘‘मैं अलबेली,
तितली मतवाली,
फूलों का मकरंद
चुनने को आई।’’
‘‘तुम्हारा क्या नाम है महकदार फूलों?’’
‘‘हम चमेली के फूल हैं।’’
अलबेली तितली के स्वागत में चमेली के फूलों ने अपनी पंखुड़ियां फैला दीं। वह चमेली के फूलों का मकरंद चखने ही वाली थी कि उसकी नजर पीले-पीले हवा में झूमते हुए फूलों पर पड़ी। वह चमेली के फूलों को छोड़ उनकी ओर उड़ चली।
‘‘कहां चली ओ अलबेली मतवाली?’’ फूलों ने पुकारा।
‘‘कल फिर आऊंगी, अलविदा चमेली।’’ यह कह कर नटखट तितली अब पीले फूलों पर मंडराते हुए गीत गुनगुनाने लगी। फिर धीरे से उनके कान में बोली-
‘‘तुम बहुत सुन्दर हो, क्या नाम है तुम्हारा?’’
‘‘हम गेंदे के फूल हैं।’’
‘‘मैं तुम्हारा मकरंद लेने आयी हूं।’’
तितली के स्वागत में फूलों ने अपनी पंखुड़ियां फैला दीं। ‘‘लो हमारा मीठा-मीठा मकरंद ले जाओ अलबेली।’’ नटखट तितली गेंदे के फूलों पर बैठने वाली ही थी कि उसकी नजर चम्पई रुग के फूलों पर पड़ी। वह अपना प्रलोभन रोक नहीं सकी और उनकी तरफ उड़ चली।
‘‘कहां चली ओ अलबेली मतवाली, हमारा मकरंद लेती जाओ!’’
‘‘मैं कल फिर आऊंगी।’’ यह कह कर तितली चम्पई फूलों की ओर बढ़ गई। उन्हें भी वह वहीं गीत सुनाने लगी। फिर कुछ रूक कर बोली- ‘‘आ हा! क्या तेज महक है तुम्हारी, तुम कौनसा फूल हो?’’
‘‘मैं चम्पा का फूल हूं।’’
‘‘मैं तुम्हारा मकरंद लेने आई हूं।’’
‘‘तुम्हारा स्वागत है, जितना चाहे मीठा-मीठा मकरंद ले लो। तभी उसकी नजर गुलाबी फूलों पर पड़ी। दरअसल बाग के खूबसूरत सुगंधित फूलों के बीच वह भ्रमित-सी हो गई थी।
‘‘कल फिर आऊंगी अलविदा!’’ यह वायदा करती तितली गुलाबी फूलों पर मंडराने लगी।
‘‘भीनी भीनी महक वाले सुन्दर फूल! तुम्हारा क्या नाम है?’’
‘‘हम गुलाब हैं, यहां के राजा!’’
‘‘मैं तुम्हारा मकरंद ले जा सकती हूं।’’
तितली के रंग-बिरंगे पंखों से खुश होकर गुलाब ने हंसकर ‘हां’ कर दी।
‘‘तुम बहुत सुन्दर हो मतवाली!’’ गुलाब से अपनी प्रशंसा सुनकर नटखट तितली झूम उठी। गुलाब की खुशबू से मस्त होकर फूलों पर थिरकने लगी। हवा में लहरा-लहरा कर चक्कर लगाने लगी कि किसी गुलाब का मकरंद ले जाऊं। इतने में एक नटखट गुलाब ने अपना कांटा तितली के पंखों में चुभो दिया।
‘‘उई मां!’’ नटखट तितली चिल्ला उठी। उसकी आवाज सुनकर बगीचे में खेल रहे बच्चे आ पहुंचे। जैसे ही तितली ने उन्हें देखा वह सिर पर पांव रख कर भागी। वह आगे-आगे और बच्चे पीछे-पीछे दौड़ रहे थे।
बच्चों से जान बचा कर वह हांफती हुई घर पहुंची। ‘‘ले आई मकरंद अलबेली!’’ मां बोली।
‘‘नहीं मां, वहां बगीचे में एक-से-एक सुन्दर फूल मुझे बुलाने लगे। सभी अपना मकरंद मुझे देना चाहते थे। फूल कभी अपने रंगों से लुभाते तो कभी अपनी खुशबू से मोहित करते।’’
‘‘फिर क्या हुआ?’’ मां ने उत्सुकता से पूछा।
‘‘मां मैं बारी-बारी से सभी फूलों पर मंडरा कर उनका आनंद ले रही थी। अंत में मुझे फूलों का राजा गुलाब पसंद आया। सबसे सुन्दर गुलाब मैं चुन ही रही थी कि एक गुलाब ने अपना कांटा मेरे पंखों में चुभो दिया।’’
दर्द से कहराती नटखट तितली अपने पंख खोलने और समेटने लगी।
‘‘ओह मेरी बच्ची!’’
‘‘मेरी आवाज सुन शरारती बच्चों का झुंड पकड़ने आ पहुंचा। उनसे बचकर भाग आई। मां मैं तुम्हारे लिए फूलों का मकरंद नहीं ला सकी।’’ आंखों में आंसू भर कर नन्हीं तितली बोली।
‘‘कोई बात नहीं अलबेली, परन्तु मेरी बात ध्यान से सुनो। जीवन में हमें बहुत-सी वस्तुएं आकर्षित करती मिलेंगी किन्तु अपने ध्येय की प्राप्ति के लिए मन को स्थिर करना चाहिए। उसे इधर-उधर भटकाने नहीं देना चाहिए। न ही किसी प्रलोभन में आना चाहिए। तभी हम अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकते है। जाओ कल फिर कोशिश करना।’’ मां उसे पुचकारते हुए बोली।


गुरुवार, 5 नवंबर 2009

दीप झिलमिला उठे

स्कूल से घर पहुंचते ही आलोक की नजर अलमारी पर रखे लड्डू की तरफ गई। प्रसन्नता से आगे बढ़ते हुए आलोक ने मां से पूछा- ‘‘मम्मी यह लड्डू कहां से आया ?’’
‘‘ बेटा ! यह कमला की सगाई का लड्डू है। ’’
‘‘ कौनसी कमला की सगाई..........? ‘‘लड्डू को मुंह की तरफ ले जाते हुए आलोक ने फिर प्रश्न किया।
‘‘अपने राधाबाई की बेटी कमला की’’
लड्डू को लेकर मुंह की तरफ बढ़ा आलोक का हाथ एकाएक वही रूक गया। उसने अनमने मन से लड्डू को फिर से प्लेट में रख दिया। मां की तरफ बढते हुए बोला, ‘‘क्या कह रही हो मम्मी? कमला की सगाई कर दी। अरे उसने तो अभी मेरे साथ छठी कक्षा में दाखिला लिया है।‘‘ आश्चर्य से आलोक बोला।
‘‘हां बेटा राधाबाई बता रही थी कि अगले महीने कमला का विवाह कर रही है।‘‘ मां ने आगे बताया।
‘‘नही मम्मी, यह ठीक नही। यह कोई उम्र है उसके ब्याह रचाने की। फिर कमला की पढ़ाई का क्या होगा? उसकी पढ़ाई बीच में छूट जायेगी। अभी उसे आगे पढ़ना चाहिए।’’
मां हंसते हुए बोली- ‘‘तुझे इससे क्या? इन लोगों मे कोई लड़कियों को पढ़ाते है क्या?’’
‘‘नही मम्मी, आपको कमला का विवाह रोकना ही होगा। आपको राधाबाई से इस बारे में बात करनी चाहिए। उन्हें समझाना चाहिए। आज हमारे स्कूल में ‘‘बालिका’’ नाम से एक डोक्यूमेन्ट्री फिल्म दिखाई गई जिसमें लडकियों के साथ होने वाले भेदभाव व अत्याचारों को दिखाया गया। इसी कारण हमारा समाज पिछड़ा हुआ है। आपको मालूम है मम्मी लड़कियों के साथ भेदभाव रखने में सबसे ज्यादा दोषी स्वयं लड़की के माता-पिता होते हैं। वे ही लड़की की पढ़ाई पर ध्यान नही देकर उसे घर के काम काज में लगा देते है। इस पर भी वे उसके खाने-पीने पर भेदभाव करते है। बाल विवाह करके तो वे उसें अज्ञान के अंधेरे में ही धकेल देते है।’’
‘‘अरे आज तू बहुत बड़ी-बड़ी बाते कर रहा है।’’ अपने नन्हें बेटे के मुंह से ऐसी बाते सुनकर हंसती हुई आलोक की मां उठ खड़ी हुई और अपने कार्यों में व्यस्त हो गई।
आलोक ने महसूस किया कि मम्मी ने उसकी बातों को कोई महत्व नहीं दिया। अब उसे ही कुछ करना होगा। मन में ठानकर आलोक अपनी पड़ौसिन सहपाठी शिखा के पास गया। उसे सारी बात बताई। आलोक की बात सुन शिखा पूरे जोश के साथ उसे सहयोग देने को तैयार हो गई। अब दौनो सहपाठी राधाबाई के घर की और चल पडे़।
राधा बाई के घर के बाहर दालान में एक खटिया पर बैठे दो विशालकाय मनुष्य एक दूसरे को भद्दी गालिया देते हंस रहे थे। शराब की दुर्गन्ध वातावरण में फैली हुई थी। आगे बढकर आलोक ने एक व्यक्ति से राधाबाई के बारे में जब पूछा तो उसने राधाबाई को एक भद्दी सी गाली देते हुए आवाज दी।
अन्दर कमला रेशमी गोटे के वस्त्रों मे सजी धजी गुडिया सी बनी बैठी हुई थी। उसने हल्का सा घूंघट भी डाल रखा था। उसके हाथों मे मेंहदी रची हुई थी। छोटा सा कोठरीनुमा कमरा पुरूषों व बच्चों से खचाखच भरा हुआ था।
यह दृश्य देख कर अलोक एक पल के लिए ठिठक गया। दूसरे ही क्षण वह साहस बटोर कर राधाबाई की ओर उन्मुख होते हुए बोला- ‘‘तुम कमला का बाल विवाह करके ठीक नही कर रही हो राधाबाई।’’
आलोक की बात सुन वहां बैठे सभी स्त्री पुरूषों के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। आलोक ने अपनी बात जारी रखी- ‘‘आपको कमला को आगे पढ़ाना चाहिए।’’
‘‘तुम क्या कहते हो बबुआ इतने सब लोगों के बीच राधाबाई सहमी सी कहने लगी- ’’तुम घर जाओं बबुआ मैं तुमसे वहीं बात करूंगी।’’
‘‘घर क्यों? यही सबके बीच में सबके सामने कहूंगा कि आप कमला के साथ अन्याय कर रही है? उसकें भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। यह हम नहीं होने देगें।’’
‘‘ब्याह करना कोई अन्याय है?’’ वहां बैठी एक स्त्री ने हंसते हुए कहा।
‘‘किन्तु विवाह सही उम्र में होना चाहिये। मैं अभी छोटी हूं और पढ़ना चाहती हूं’’ कमला घूंघट हटाते हुए बोली।
‘‘हां बिल्कुल पढ़ाई से वंचित कर बाल विवाह करना अन्याय है।’’
‘‘जाओं बबुआ जाओ’’ राधाबाई आलोक से विनती के स्वर में बोली। इस खुशी के मौके पर हम गरीब के रंग में भंग मत डालो। हम गरीब सही पर सब लोगों के बीच हमारा तमाशा मत बनाओं। मैं तुम्हारे हाथ जोडती हूं बबुआ।‘‘ गिड़गिड़ाती हुई राधा बाई ने कमला को अंदर धकेल दिया। फिर साड़ी के पल्ले को मुंह में ठूंसकर रो पड़ी।
इस पर घर में शोर-शराबा सा मच गया। हंगामा सुनकर बाहर बैठे शराबी भी भीतर आ गये। जो शायद कमला के पिता व होने वाले श्वसुर थे।
राधा बाई का करूण व दूसरों का आक्रामक रूख देखकर उन्होंने वहां से निकल जाना ही उचित समझा।
रास्ते मंे आलोक व शिखा अपने सभी साथियों से मिले व उन सभी ने मिलकर एक योजना बनाई। योजना अनुसार दूसरे दिन स्कूल में सभी बच्चे प्रधानाचार्य जी के कक्ष मे एक साथ पहुंचे। सभी छात्र-छात्राओं को अपने कक्ष में एक साथ पाकर प्रधानाचार्य जी कुछ चौंके कि क्या बात हुई? बच्चों ने उन्हें एक पार्थना पत्र दिया जिसमंे कमला के बाल विवाह को रूकवाने का आग्रह किया हुआ था।
‘‘यह तुम लोगों ने बहुत अच्छा किया जो समय रहते मुझे सूचना दी। मैं वायदा करता हूं कि कमला का बाल विवाह रूकेगा ही नहीं बल्कि उसकी पढ़ाई भी पुन: जारी रहेगी। सभी बच्चों को प्रसन्नता से देखते हुए प्रधानाचार्य जी यह सब बोल रहे थे।
प्रधानाचार्य जी ने कमला के माता पिता को स्कूल में बुलवाया। कमला के माता पिता अपने दोनों हाथ जोड़े हुए प्रधानाचार्य जी के सामने खडे़ हुए थे।
‘‘आईये, बैठिए।’’ विनम्रता से उनका स्वागत करते प्रधानाचार्य जी बोले,’’ क्या बात है आज कल कमला स्कूल नहीं आ रही।’’
कमला के माता-पिता चुप खडे़ थे।
उन्हें चुप देख प्रधानाचार्य जी आगे बोले- मैंने सुना है तुमने कमला की सगाई कर दी और अगले माह उसका ब्याह करने वाले हों।’’
हां मास्टर सा अब वह स्कूल नही आयेगी.......’’।
‘‘यह तुम क्या कह रही हो? मां होकर बेटी के उन्नति के मार्ग को रोक रही हो। अभी तुमने ‘‘हमराही’’ धारावाहिक मे ‘‘अंगूरी’’ की मौत नही देखी?’’
विनम्रता तोड़ते हुए जब गुस्से से गुरूजी कड़वा सच बोले तो अंगूरी के उदाहरण मात्र से कमला के अनिष्ट की आशंका से राधाबाई का रोया-रोया कांप उठा। सारा दोष कमला के पिता पर मढ़ते हुए बोल उठी,’’ इन्होंने ही लिए कमला के ससुर से दो हजार रूपये। दो हजार रूपये के पीछे मेरी बच्ची... आप ही कुछ समझाओं मास्टर सा. ये रूपये भी शराब में उड़ा देगा यह... राधा बाई बोलती-बोलती फफक कर रो उठी।
‘‘जानते हो बाल विवाह कानूनी जुर्म है। मैं पुलिस में रिपोर्ट लिखवाकर तुम्हें जेल भिजवा दूंगा।’’
पुलिस व जेल का नाम सुनते ही कमला के शराबी पिता को थोड़ा होश आया। सारा दोष अपनी पत्नी के सिर मढ़ते हुए बोला- ’’माफ करें मास्टर सा. वो तो कमला की मां को नाच गाने का बहुत शौक है। इसी मारे ब्याह करवा रहे है कि घर में कुछ धूमधाम होगी।
गुरूजी हंसते हुए बोले, ‘‘यदि नाच गाने का इतना ही शौक है तो शनिवार को स्कूल आ जाया करों। बाल सभा में खूब नाच गाने की
धूम करवा दूंगा। तुम्हें शौक है तो तुम भी नाच गा लेना। पर नाच गाने की ओट में कमला का बाल विवाह न होने दूंगा।’’ प्रधानाचार्य जी कमला के माता-पिता को घुड़काते कह रहे थे।
आज दीपावली का दिन था। सभी छात्र-छात्राओं ने प्रधानाचार्य से इजाजत लेकर इस विद्या मन्दिर को खूब सजाया। हमेशा दीपावली पर बंद रहने वाला स्कूल आज नयी पीढ़ी से गमक रहा था। आलोक, शिखा व अन्य बच्चों के साथ कमला भी थिरक थिरक कर काम कर रही थी। सभी का एक उद्देश्य था विद्या मन्दिर हमेशा सजा रहे। इसकी रोशनी सर्वत्र फैले। अज्ञान का अंधकार दूर हो।
रात को स्कूल के हर कंगूरे पर नन्हे नन्हे दीप झिलमिला रहे थे। मानो वे अपने अस्तित्व का बोध करा रहे हो-
हम दीप चाहे नन्हें नन्हें हो पर अपनी ज्योति से अमावस्या के अंधेरे को भगा सकते है।


मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

अबोला दर्द

बेहद गर्मी थी, उफ! ये मई का महीना। हाल यह कि पेड़ का एक पत्ता भी नहीं हिल रहा। भरी दुपहरी में जब लोग पंखे कूलर में सो रहे थे तब अकेला बबलू कंचे खेलने में मशगूल था। उसके ललाट से पसीना रिसता हुआ गालों तक आ रहा था।
एक दो तीन चार....... बबलू ने कंचे गिनना शुरू किया। पूरे 15 कंचे उसकी मुट्ठी में बंद थे। हरे, नीले, लाल, पीले, नारंगी रंग के कंचे में एक था नारंगी हरी सफेद धारियों वाला बबलू का सबसे प्यारा कंचा। उसे अलग निकाल बबलू ने उसे चुम्मा दिया- ‘‘आ हा! मेरे प्यारे कंचे। सबसे पकौड़ा।’’ कुल दस कंचे गिनकर उसने निकर की जेब के हवाले किये। बाकि के गोल मटोल कंचों को आंगन में बनी ‘गुच्च’ की ओर उछाल दिया। सभी कंचे बिखर गये और एक कंचा गुच्च में जा गिरा। बबलू ने अपना प्यारा तिरंगा कंचा हाथ में रखे हुए था। उसने निशाना साधा और नीचे गिरे कंचे पर कंचा दे मारा।
गर्मी की तपन और पसीने की चुहन से बेखबर बबलू निशाने पर निशाने साध रहा था। इतने में छत की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर फड़फड़ाहट की आवाज आयी। खेल छोड़ बबलू का ध्यान जीने की ओर गया। देखा, खून से लथपथ एक घायल कबूतर वहां गिरा पड़ा है। बहता हुआ खून देख उसकी चीख निकल गई-
‘‘दीदी · दीदी · · जल्दी आओ · ’’
बबलू की चीख सुन उसकी बहन बाहर की ओर लपकी - ‘‘क्या हुआ बबलू? तुम ठीक तो हो भैया।’’

‘‘दीदी, दीदी देखो, यहां एक घायल कबूतर आ गिरा है।’’ बबलू ने कबूतर की ओर इशारा करते हुए कहा।
‘‘देखूं तो कहां? ओह! इस बिचारे को तो किसी ने जख्मी कर दिया है।...... बेचारे के बहुत खून बह रहा है।’’ कहते हुए शायदा ने कबूतर को सावधानी पूर्वक उठा लिया।
‘‘आओ, अन्दर कूलर की हवा में इसे ले चलते है। वहीं इसकी पट्टी बांधते है।’’
‘‘दीदी पूजाघर से रूई ले आऊं?’’
‘‘हां, साथ में डिटोल भी’’
बबलू दौड़कर रूई का फाहा, डिटोल और पट्टी के लिए पुराना साड़ी का फॉल उठा लाया और घाव से रिसता खून फाहे से पौछने लगा। दोनों पंखों के बीच, गर्दन के नीचे पूरा मांस बाहर निकल आया था। शायदा ने फॉल को लपेटकर कसकर पट्टी बांध दी। कबूतर बराबर फड़फड़ा रहा था।
‘‘दीदी, बेचारे के बहुत दर्द हो रहा होगा।’’ बबलू ने दर्द में डूबकर कहा।
‘‘हां, जाकर एक कटोरी में पानी ले आ, यह प्यासा भी होगा।’’ बबलू दौड़कर पानी ले आया। वे कबूतर को पानी पिलाने की कोशिश करने लगे पर उसने चोंच गीलीकर बाहर निकाल ली। बंधी हुई पट्टी खून से गिली हो गई शायदा बोली- ‘‘ कहीं बेचारा मर न जाय। चल बबलू, इसे अस्पताल ले चलते है।’’
‘‘इसे अस्पताल?’’
‘‘हां जानवरों के अस्पताल। मैं जानती हूं यहां से थोड़ी दूर ही है।’’ शायदा चिंतित होते बोली।
‘‘वहीं, सरकारी पशु चिकित्सालय न! जिसमें टॉमी को ले जाया जाता था।’’
‘‘हां वहीं, चल जल्दी कर। कहीं बेचारे की जान ही न निकल जाए। चलो तुम मेरे पीछे इसे लेकर स्कूटी पर बैठ जाना।’’
‘‘दीदी तुम स्कूटी चलाओगी?’’
‘‘हां हां, क्यों नहीं। इतना तो मुझे चलाना आता है। इस बिचारे की जान जो खतरे में है।’’
दोनों भाई बहन स्कूटी पर सवार होकर पशु चिकित्सालय की ओर निकल पड़े। बीच में चौराहा आ गया। दोपहरी का समय था इसलिए चौराहा लगभग खाली था। शायदा को अस्पताल पहुंचने की जल्दी थी अत: उसने लालबत्ती होने के बावजूद भी सड़क क्रॉस करनी चाही। उसे ऐसा गलत करते देख ट्रेफिक पुलिस ने सीटी बजाई और उसे बीच चौराहे में ही रोक लिया।
‘‘ऐं लड़की! क्या बत्ती दिखाई नहीं पड़ती?’’ पुलिस वाला सख्ती से बोला।
‘‘दिख तो रही है पर इमरजेंसी है इसलिए....’’
‘‘कैसी इमरजेंसी? तुमने हेलमेट तक नहीं पहना। ट्रेफिक कानून को तोड़ती हो। अभी चालान बनाता हूं।’’
‘‘पुलिसजी हमें माफ कर दो। गलती हो गई। इमरजेंसी नहीं होती तो मैं कदापि कानून नहीं तोड़ती। बिचारी एक नन्हीं सी जान पर बन आयी है....’’
‘‘.....देर हो गई तो यह मर जायेगा।’’ दीदी का अधूरा वाक्य पूरा करते हुए बबलू ने खून से लथपथ कबूतर को आगे हाथ बढ़ाकर पुलिस वाले को बताया। ट्रेफिक पुलिस वाले की नजर कबूतर पर गिरी तो वह चौंका-
‘‘यह क्या है?’’
‘‘घायल कबूतर। पुलिस भैया, यह घायल हुआ हमारे घर के आगंन में आ गिरा।’’
‘‘ओह! बच्चों, चलो जल्दी करो। इसे जल्दी से अस्पताल पहुंचाओ। पर ध्यान रखना आईंदा सड़क कानून का उल्लघंन करोगे तो जुर्माना तो करूंगा ही, लॉकअप में भी बंद कर दूंगा।’’
‘‘ठीक है भैया अब दुबारा गलती नहीं होगी। हमें जाने दो...।’’
‘‘जाओ जल्दी पहुंचों। कहीं बेचारे की जान ही न निकल जाय।’’
जब वे दोनों अस्पताल पहुंचे तो पता चला अस्पताल बंद हो चुका है। डॉक्टर घर जा चुका है।
‘‘ओह! क्या यहां आपत्तकालीन सेवाएं नहीं उपलब्ध है?’’
‘‘हैं क्यूं नहीं’’ कहते हुए पीछे के दरवाजे से एक व्यक्ति ने आते हुए आगे पूछा, ‘‘कहो, क्या बात है। मैं यहां का कम्पाऊंडर हूं।
‘‘ओह! आप मिल गये अच्छा हुआ। इस कबूतर को देखिए।’’ बबलू ने दोनों हाथों के बीच लगभग बेजान हुए कबूतर को आगे बढ़ाते हुए कहा। जख्मी पक्षी देख कम्पाऊंडर ने उसके हाथ से कबूतर ले लिया और देखने लगा। मामले की गम्भीरता को देखते हुए उसने तत्काल एक कक्ष खोल दिया और कबूतर की जांच करने लगा। ‘‘खून बहुत बह गया है बच्चों। कुछ कहा नहीं जा सकता। डॉक्टर को बुलाना होगा शायद तत्काल ऑपरेशन करना पड़े। यह देखो इसके घाव में पीली धातु का यह टुकड़ा गड़ा हुआ है।’’ दोनों भाई-बहन झुककर स्ट्रेचर पर लेटे कबूतर को देखने लगे।
‘‘अब क्या होगा?’’ बबलू ने अधीरता से पूछा।
‘‘डॉक्टर को बुलाना होगा। तुम फिक्र मत करो बच्चों मैं अभी डॉक्टर को फोन करके बुलाता हूं।’’ कम्पाऊंडर ने जेब से मोबाईल निकाल कर फोन लगाया। डॉक्टर से बात हुई।
‘‘अभी डॉक्टर को आने में वक्त लगेगा। जितने मैं इसका घाव साफ करके प्राथमिक चिकित्सा कर देता हूं।’’ कम्पाऊंडर के सधे हाथ कबूतर के घाव की सफाई करने लगे। लगभग 10 मिनिट बाद डॉक्टर आ गये। उन्होंने कबूतर का तत्काल ऑपरेशन किया और पीले धातु के टुकड़े को निकालकर बिखरे मांस को ठीक कर टांके लगा दिये। उस पीले
धातु के टुकड़े को उठाकर डॉक्टर ने परखा- ‘‘यह तो किसी गोली का खोल लग रहा है। गोली तो शायद मांस को छिलती हुई आगे निकल गई किन्तु उसका खोल मांस फटने से भीतर ही धंसकर अटक गया लगता है।’’
‘‘डॉक्टर सा. इस बेजुबान को किसने गोली मारी होगी?’’
‘‘देखो, ध्यान से देखो। इस खोल पर बहुत बारीक अक्षर में कुछ अंकित र्र्है।’’
‘‘जरा पढ़कर देखती हूं कहते हुए शायदा ने वह टुकड़ा उठा लिया। ‘‘यह तो पड़ौसी देश का नाम लिखा हुआ है। जरूर दुश्मनों ने इसपर अपना निशाना साधा होगा।’’
‘‘डॉक्टर सा. क्या यह ठीक हो जायेगा? इसकी जान बच जायेगी?’’
‘‘अब यह खतरे से बाहर है। इसे यहां तीन दिन भर्ती रखना पड़ेगा बच्चों। फिर चाहे इसे तुम ले जा सकते हो। इस पर दया दिखाकर यहां ले आये यह बहुत अच्छा किया तुमने। तुम बहुत अच्छे बच्चे हो।’’ कहते हुए डॉक्टर सा. ने उनकी पीठ थपथपा दी।
‘‘क्या इसे देखने हम यहां रोज आ सकते है?’’ बबलू ने पूछा तो डॉक्टर ने कहा-
‘‘हां हां, क्यों नही।’’
‘‘हम रोज इससे मिलने आया करेंगे डॉक्टर साहब।’’
‘‘हां, परन्तु जल्दबाजी में नहीं ट्रेफिक नियमों की पालना करते हुए आना।’’