बधाई उन बच्चों को जिनकी मुर्गी ने पहला सुनहरा अण्डा दिया

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सोमवार, 23 नवंबर 2009

नटखट तितली

नटखट तितली की मां बीमार थी। वह फूलों का मकरंद लाने में असमर्थ थी। मां की यह स्थिति देख नटखट तितली बोली- ‘‘मां आप आराम करो। आज मैं फूलों का मकरंद ले आऊंगी।’’
‘‘जरूर जाओ बेटी, पर सुन्दर-ताजे, खुशबू वाले फूलों का मकरंद ही चुनना, साथ ही जरा तितली पकड़ने वाले बच्चों से सावधान भी रहना।’’ मां की बात पूरी सुने बिना ही नन्हीं नटखट तितली अपने रंग-बिरंगे पंख फैला कर उड़ चली। बगीचे में रंग-बिरंगे फूल खिले थे। यह देख तितली खुशी से झूम उठी। ‘‘आ हा! कितने सुन्दर फूल! कमाल की खुशबू है इनमें!’’ वह सफेद फूलों की ओर बढ़ी और उन पर मंडराते हुए गाने लगी-
‘‘मैं अलबेली,
तितली मतवाली,
फूलों का मकरंद
चुनने को आई।’’
‘‘तुम्हारा क्या नाम है महकदार फूलों?’’
‘‘हम चमेली के फूल हैं।’’
अलबेली तितली के स्वागत में चमेली के फूलों ने अपनी पंखुड़ियां फैला दीं। वह चमेली के फूलों का मकरंद चखने ही वाली थी कि उसकी नजर पीले-पीले हवा में झूमते हुए फूलों पर पड़ी। वह चमेली के फूलों को छोड़ उनकी ओर उड़ चली।
‘‘कहां चली ओ अलबेली मतवाली?’’ फूलों ने पुकारा।
‘‘कल फिर आऊंगी, अलविदा चमेली।’’ यह कह कर नटखट तितली अब पीले फूलों पर मंडराते हुए गीत गुनगुनाने लगी। फिर धीरे से उनके कान में बोली-
‘‘तुम बहुत सुन्दर हो, क्या नाम है तुम्हारा?’’
‘‘हम गेंदे के फूल हैं।’’
‘‘मैं तुम्हारा मकरंद लेने आयी हूं।’’
तितली के स्वागत में फूलों ने अपनी पंखुड़ियां फैला दीं। ‘‘लो हमारा मीठा-मीठा मकरंद ले जाओ अलबेली।’’ नटखट तितली गेंदे के फूलों पर बैठने वाली ही थी कि उसकी नजर चम्पई रुग के फूलों पर पड़ी। वह अपना प्रलोभन रोक नहीं सकी और उनकी तरफ उड़ चली।
‘‘कहां चली ओ अलबेली मतवाली, हमारा मकरंद लेती जाओ!’’
‘‘मैं कल फिर आऊंगी।’’ यह कह कर तितली चम्पई फूलों की ओर बढ़ गई। उन्हें भी वह वहीं गीत सुनाने लगी। फिर कुछ रूक कर बोली- ‘‘आ हा! क्या तेज महक है तुम्हारी, तुम कौनसा फूल हो?’’
‘‘मैं चम्पा का फूल हूं।’’
‘‘मैं तुम्हारा मकरंद लेने आई हूं।’’
‘‘तुम्हारा स्वागत है, जितना चाहे मीठा-मीठा मकरंद ले लो। तभी उसकी नजर गुलाबी फूलों पर पड़ी। दरअसल बाग के खूबसूरत सुगंधित फूलों के बीच वह भ्रमित-सी हो गई थी।
‘‘कल फिर आऊंगी अलविदा!’’ यह वायदा करती तितली गुलाबी फूलों पर मंडराने लगी।
‘‘भीनी भीनी महक वाले सुन्दर फूल! तुम्हारा क्या नाम है?’’
‘‘हम गुलाब हैं, यहां के राजा!’’
‘‘मैं तुम्हारा मकरंद ले जा सकती हूं।’’
तितली के रंग-बिरंगे पंखों से खुश होकर गुलाब ने हंसकर ‘हां’ कर दी।
‘‘तुम बहुत सुन्दर हो मतवाली!’’ गुलाब से अपनी प्रशंसा सुनकर नटखट तितली झूम उठी। गुलाब की खुशबू से मस्त होकर फूलों पर थिरकने लगी। हवा में लहरा-लहरा कर चक्कर लगाने लगी कि किसी गुलाब का मकरंद ले जाऊं। इतने में एक नटखट गुलाब ने अपना कांटा तितली के पंखों में चुभो दिया।
‘‘उई मां!’’ नटखट तितली चिल्ला उठी। उसकी आवाज सुनकर बगीचे में खेल रहे बच्चे आ पहुंचे। जैसे ही तितली ने उन्हें देखा वह सिर पर पांव रख कर भागी। वह आगे-आगे और बच्चे पीछे-पीछे दौड़ रहे थे।
बच्चों से जान बचा कर वह हांफती हुई घर पहुंची। ‘‘ले आई मकरंद अलबेली!’’ मां बोली।
‘‘नहीं मां, वहां बगीचे में एक-से-एक सुन्दर फूल मुझे बुलाने लगे। सभी अपना मकरंद मुझे देना चाहते थे। फूल कभी अपने रंगों से लुभाते तो कभी अपनी खुशबू से मोहित करते।’’
‘‘फिर क्या हुआ?’’ मां ने उत्सुकता से पूछा।
‘‘मां मैं बारी-बारी से सभी फूलों पर मंडरा कर उनका आनंद ले रही थी। अंत में मुझे फूलों का राजा गुलाब पसंद आया। सबसे सुन्दर गुलाब मैं चुन ही रही थी कि एक गुलाब ने अपना कांटा मेरे पंखों में चुभो दिया।’’
दर्द से कहराती नटखट तितली अपने पंख खोलने और समेटने लगी।
‘‘ओह मेरी बच्ची!’’
‘‘मेरी आवाज सुन शरारती बच्चों का झुंड पकड़ने आ पहुंचा। उनसे बचकर भाग आई। मां मैं तुम्हारे लिए फूलों का मकरंद नहीं ला सकी।’’ आंखों में आंसू भर कर नन्हीं तितली बोली।
‘‘कोई बात नहीं अलबेली, परन्तु मेरी बात ध्यान से सुनो। जीवन में हमें बहुत-सी वस्तुएं आकर्षित करती मिलेंगी किन्तु अपने ध्येय की प्राप्ति के लिए मन को स्थिर करना चाहिए। उसे इधर-उधर भटकाने नहीं देना चाहिए। न ही किसी प्रलोभन में आना चाहिए। तभी हम अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकते है। जाओ कल फिर कोशिश करना।’’ मां उसे पुचकारते हुए बोली।


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