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बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

ईश्वर

कूदकू चूहे को आज से पहले कोई जानता तक नहीं था। जानता तो क्या, न किसी ने नाम सुना था। ना ही उसे देखा था कभी। कौन है और कहां से आया किसे मालूम नहीं। किसने रखा होगा उसका यह नाम कूदकू?  
लम्बी लम्बी कूद लगाने के कारण ही उसका नाम कूदकू रख दिया होगा। तभी तो कूदता फांदता वह इस देवालय की इमारत में घुस आया। 
पुजारी देवप्रतिमा की पूजा करता। सुबह से लोगों का ईश्वर के दर्शन करने के लिए आना जाना शुरू हो जाता। लोग अपने साथ चढ़ावे के लिए प्रसाद लेकर आते। मिठाई, फल व सूखे मेवे का प्रसाद चढ़ा जाते। कुछ भोग का हिस्सा पुजारी रख लेता बाकी लोगों में बांट देता। फिर भी थोड़ा बहुत यहां वहां बिखरा शेष रह जाता। कूदकू चूहे के तो मजे हो गये। क्योंकि दोपहर देवालय बंद हो जाता। इसके बाद  शाम को खुलता जो रात्रि को बंद हो जाता। आराम से भोग लगे पकवानो के आन्ंद लेता। बंद देवालय में निर्भय होकर इधर उधर कूदता फांदता रहता। थोडे ही दिनों में मरियलसा दिखने वाला कूदकू मोटा तगड़ा पहलवान सा दिखने लगा।
आराम से खाना और बेधड़क घूमने के साथ साथ कूदकू की अक्ल भी मोटी हो गई। मोटी क्या यूं समझो भोंथरी हो गई थी। तभी तो अब वह देवालय बंद होने का इंतजार भी नहीं करता और मजे से ईश्वर को चढ़ाये गये प्रसाद में मुंह मारता। कभी देवप्रतिमा पर चढ़ जाता तो कभी पुजारी पर। अपने कुतरने की आदत से मजबूर कूदकू कभी ईश्वर के वस्त्र कुतर लेता तो कभी गले की फूलमाला। कभी पुजारी के पांवो को गुदगुदाते हुए पेट से होता सिरपर चढ़ जाता। बेचारे पुजारी हो हो करके कूदने लगते। लोगो में खूब तमाशा हो जाता। कभी पूजा की थाली उलट जाती तो कभी दिया बाती औंधे मुंह गिरे मिलते। इतना भी बर्दाशस्त हो रहा था मगर अब तो कूदकू ने तहजीब की सारी हदे ही लांघ ली। देवप्रतिमा क्या, देवालय क्या कोई जगह ऐसी नहीं बची जहां कूदकू की मींगणियां और उसकी बास न हो।
पुजारी के नाम में दम हो ही गया था। सबको प्रेम, बल और शरण देने वाले ईश्वर भी अब कूदकू के इस आचरण से नाराज हो गये। उन्होंने पुजारी को कूदकू चूहे को देवालय से बाहर निकाल दूर फेंक देने का आदेश दिया।  
पुजारी एक चूहेदानी ले आया। कूदकू को बड़े दिनों बाद आचार और रोटी की 
सौंधी खशबू आयी। इतने दिन मीठा खाते खाते वह भी उकता चुका था। बेफिक्री से खुद के लिए बिछे जाल से अनजान कूदकू चूहा आचार रोटी के लालच में पिंजरे में घुस पड़ा।
बस वह पकड़ा गया अब वह पिंजरे की कैद में था।
कैदी कूदकू को पुजारी दूर जंगल में नदी किनारे छोड़ आया। जहां खाने को कुछ नहीं और चारों तरफ से जान को खतरा ही खतरा था। वह दिन कूदकू का बहुत बुरा बीता। पूरे दिन खाने को नहीं मिला, जान के लाले पड़ गये सो अलग। 
‘अरे कूदके ये जान कैसी आफत में आ फंसी। ये क्या मुश्किल हो गई?’ इधर उधर जान बचाने के लिए भागता फिर रहा कूदकू यही सोच रहा था। रात का अंधेरा तो उसके लिए और खतरनाक हो गया। जिसे बिल समझकर पनाह ले क्या पता वहीं भीतर बैठा हो काला नाग। उसे निगलने के लिए। न जाने कब और कौनसा पल उसकी मौत का बन जाए। एक नाग ही क्या कहीं तगड़ा अजगर तो कहीं बिलाव दिखाई दे रहे है। उसकी तो अब खैर नहीं। कई छोटे बड़े जंगल के जीव-जन्तु उसे देखते ही शिकार के लिए तैयार बैठे है। 
डर और भूख से कूदकू थरथराने लगा। इस कठीन घड़ी में उसे देवालय में बैठे ईश्वर की याद आयी। इसके साथ ही उसे अपनी गलतियों और लापरवाहियों का ख्याल आया। 
‘ना वो पुजारी को तंग करता.....ना वो देवालय में अशोभनीय असभ्य व्यवहार करता तो आज उसकी ये दुर्गति नहीं होती। आसानी से मिलने वाले सुख की उसने कद्र ही नहीं की। अब तो जान पर बन आयी है। न जाने कौन सा पल उसे मौत की नींद सुला देगा। हे! ईश्वर मुझे क्षमा करना। मुझसे भूल हुई।’ उसने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की। ‘मुझे वापस अपने पास बुला लो। मैं अब कभी भी अपनी सीमाओं का उल्लघंन नहीं करूंगा। कोई भी खराब आचरण नहीं करूंगा।’’ 
बुदबुदाने के साथ टप! टप! आंसू की बूंदे उसकी आंखों से टपकने लगी।
एक नन्हें चूहें की ये दशा ईश्वर से भी नहीं देखी गई। सोचा, ‘नादान बच्चा है। एक बार क्षमा कर दें। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया है और साथ ही पश्चाताप भी कर रहा है।’ ईश्वर ने नींद में सोते हुए पुजारी को सपने में आदेश दिया- जाओ कूदकू चूहे को ले आओ। उसके बिना हमें भी तो सूना सूना लग रहा है। जब तुम सब चले जाते हो तो वही तो एक साथी होता है मेरा।
पुजारी सुबह उठकर अपना कपड़ों का थैला उठाए नदी पर नहाने चला गया। 
इधर कूदकू भी नदी तक पहुंच चुका था। जैसे उसे पुजारी के आने की खुशबू आ गई हो। मौका देखकर वह उसके कपड़े के थैले में घुस गया। इस तरह वह फिर देवालय में पहुंच गया। ईश्वर कूदकू को देखकर मुरूकुराये - ‘आ गये तुम!’
कूदकू ने विनम्र भाव से कहा - ‘‘मैं समझ गया ईश्वर! सुपात्र को तुम देते हो और कुपात्र से सब दीन लेते हो। पर हो दयालु बड़े। गलती मान लेने पर माफ कर देते हो। यही तो वो कारण है जो तुम्हें प्रतिमा से ईश्वर बनाता है। 

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